प्यारी बेटियों, प्लीज़ शादी मत करो!

पूरी दुनिया में मैं शायद इकलौती ऐसी इंडियन मां होऊंगी जिसने अपनी बेटियों को शादी ना करने की सलाह दी होगी। और वह भी कभी ना करने की। सुनने वाले मेरी इस बात पर हंसते हैं। अमूमन भारतीय माओं के अपने बेटे या बेटियों की शादी को लेकर बहुत सपने होते हैं। ऐसे में अगर एक मां होकर भी मैं इसके खिलाफ बात कर रही हूं, तो लोगों को यह मजाक लग सकता है — शायद आज सुबह मैं अपने पति से झगड़ा करके आई हूं, इसलिए मैं ऐसा कह रही हूं, है ना?

लेकिन मैं यह पूरी गंभीरता के साथ कहती हूं। बेटियों, शादी मत करना। 21वीं सदी में भी शादी का अर्थ महिलाओं के लिए पहले जैसा ही है। आज भी, विवाह-संस्था के साथ वही पितृसत्तात्मक सोच चल रही है, जिसमें पति की आर्थिक, शारीरिक, भावनात्मक और सामाजिक जरूरतों को पत्नी से कहीं ऊपर रखा जाता है।

आज भी शादी के बाद औरत अपना नाम बदलती है, अपना घर छोड़ती है, एक नए परिवार को अपनाती है। घर संभालना अनिवार्य रूप से उसी का काम होता है, रिश्ते बनाए रखना उसी की जिम्मेदारी है, बूढ़ों और बच्चों की देखभाल आज भी उसी के जिम्मे है और बच्चे पैदा होने पर नौकरी भी उसे ही छोड़नी पड़ती है।

हिंदुस्तानी लड़कियों के सपने नया रूप ले रहे हैं, अब वे घर से बाहर निकलना चाहती हैं, नौकरी करना और आजादी से रहना चाहती हैं, लेकिन हिंदुस्तानी लड़के आज भी उनसे अपने लिए चाय बनाने और अपने कपड़े धोने की उम्मीद ही रखते हैं।

शादी की संस्था हमेशा औरत को कमज़ोर करती है और उसकी जिम्मेदारियों को बढ़ाती है।

अगर आप भाग्यशाली हैं, तो आपका पति आपसे प्यार करता है, और आपकी ज़रूरतों का खयाल रखता है. लोग कहते हैं, “शुक्र करो, किस्मत वाली हो.” जैसे कि अच्छा पति सिर्फ चुनिंदा औरतों की किस्मत में ही हो सकता है — जैसे कि ये एक औरत का हक़ नहीं, लक है.

अगर आप बदकिस्मत हैं, तो आपको ऐसा पति मिलता है जो आपका अपमान या आलोचना करता रहता है, या फिर मार-पिटाई, रेप या नज़रअंदाज़ी। लोग कहेंगे, “घरेलू मामला है, एडजस्ट करो।”

हालांकि ज़्यादातर शादियां इन दोनों चरम सीमाओं के बीच में होती हैं. कोई इतना सोचता नहीं है कि ये अच्छी है या बुरी। ये ज़िन्दगी की एक आवश्यकता है, बस, जैसे रोटी-कपडा-मकान-शादी।

कुछ दशक पहले तक औरतों के लिए शादी का मतलब होता था एक ऐसे रिश्ते से जुड़ना जहां उन्हें सुरक्षा, सामाजिक सम्मान,आमदनी, बच्चे, और बुढ़ापे के लिए एक साथी मिल पाए। ऐसे में अगर उन्हें इसके साथ कुछ समझौते भी करने पड़ते थे, तो वे करती थीं। लेकिन आज के वक्त में बिना शादी किये भी औरतें ये सारी चीजें अपने लिए जुटा सकती हैं। तो फिर उन्हें क्या जरूरत है एक पति का भार भी साथ लेकर चलने की?

मैं, जो दो बार शादी कर चुकी हूं, जब ऐसा कहती हूं, तो यह मायने रखता है, कि नहीं? मेरी दोनों ही शादियां एक-दूसरे से बिल्कुल अलग थीं। एक अरेंज्ड थी, तो दूसरी मेरी अपनी पसंद से की हुई। एक किसी जेल की सजा से कम नहीं, तो दूसरी उस सजा से मुक्ति थी। एक डर और नफरत से भरा नर्क था, तो दूसरी प्यार और चाहतों से भरा कोई स्वर्ग। एक ने मुझे तोड़ा, दबाया और शक्तिहीन कर दिया; तो दूसरी ने मुझे पंख दिये, जख्मों पे मरहम लगाया और मुझे आगे बढ़ाया।

दिलचस्प बात ये है कि दोनों ने ही मुझमें आध्यात्मिकता को जगाया। दोनों ने ही मुझे खुद को समझने और खुद को तलाशने में मदद की।

लेकिन आत्म-विकास करने के लिए आपको शादी करने की जरूरत नहीं है। अब और नहीं।

हां, आज के मेरे पति एक अच्छे इंसान हैं और मेरे सबसे अच्छे दोस्त भी। लेकिन हम दोनों ही यह बात मानते हैं कि शादी करने से हमारे रिश्ते में पहले से अलग कुछ भी नया नहीं आया है, सिवा इसके कि हमारे इस रिश्ते को समाज भी अब मानता है, जो हमारी पीढ़ी के लिए एक आवश्यकता थी। लेकिन आपकी पीढ़ी के लिए ऐसा ज़रूरी नहीं है

शादी को लेकर अब तक जो मैंने जाना है, वो ये कि — अच्छी हो या बुरी — आपकी शादी आपके अपने आत्म-संबंध पर निर्भर है।

चाहे आप अपने आप से प्यार करें या अपने आप को कोसें, आपका रिश्ता एक आईने की तरह वही सब भावनाएं आपको वापस प्रतिबिंबित करता है। इस रिश्ते में रहते हुए आपके लिए हर दिन अपने आप में किसी नए सफर की तरह होता है, जिसमें आपको अपने अंदर की असुरक्षा, आशंका, सामाजिक डर, दबाव और त्रासदियों का सामना करना पड़ता है। यह सब ‘मानसिक सफाई’ तो आपको खुद ही करनी पड़ती है — साथ-साथ अपने ससुराल की भौतिक सफाई भी!

ग़लत मत समझना, मैं पुरुषों के ख़िलाफ़ नहीं हूँ। पुरुष कमाल के प्रेमी हो सकते हैं और बेहतरीन साथी हो सकते हैं। लेकिन उनकी खूबियों को आज़माने के लिए उनसे शादी करने की जरूरत नहीं है। अपनी आजादी, सम्मान और इच्छाओं को खुले दिल से अपनाइये और हक़ से मांगो। अपने पार्टनर को आपके हर एक दिन को पाने के लिए मेहनत करने दो।

पति में परमेश्वर नहीं, खुद में देवी देखना सीखो।

मैं मन ही मन उस दिन की कामना करती हूं जब भारतीय महिलाओं की पूरी पीढ़ी सार्थक और समान संबंधों के पक्ष में इस रूढ़िवादी संस्था को खारिज कर देगी। तभी स्वयं को सर्वेसर्वा समझने वाले भारतीय पुरुष बदलेंगे। तभी समाज का विकास होगा और हम ‘पितृसत्तात्मक समाज का अंत (#SmashThePatriarchy)’ होने की उम्मीद कर सकते हैं।

पर तब तक, चाहे आप एक बार दिल खोएं या कई बार; चाहे बच्चे पालें या पिल्ले; घर चलाएं या कंपनी; पूरी चाहत के साथ अपने सपनों को पूरा करते हुए आगे बढ़ो। बस शादी मत करो।

लीड फोटो: एयरपोर्ट पर अपनी बड़ी बेटी को आगे की पढ़ाई के लिए विदा करते हुए

अपडेट, दोपहर 2.24: मेरे पति कहते हैं कि उन्हें इस लेख या मेरी सोच से कोई मतलब नहीं है  इसलिए अनुरोध है कि उनको सहानुभूति भरे मैसेज भेजना बंद करें  (लेकिन वे ये जरूर चाहते हैं हमारी बेटियों को प्रपोज करने की प्लानिंग रखने वाले लड़के इसे पढ़ें)

यह पहले इंग्लिश में यहाँ छपा था। इसका हिंदी में अनुवाद किया है शिप्रा पराशर ने।

1 comment on “प्यारी बेटियों, प्लीज़ शादी मत करो!

  1. दिलीप बळवंत कदम

    आपल्या विचारांचा मी आदर करतो. आज मी आणि माझी फॅमिली याच कारणाने त्रस्त आहे.
    हा निर्णय आम्ही माझ्या मुलीच्या आणि नातीच्या
    भावी आयुष्यात नविन पर्व परिवर्तीत करण्यासाठी
    ऊचलंल आहे. धन्यवाद. ओम साई राम…..

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